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Sunday, February 28, 2010

दण्ड अधिनियमों का दाह संस्कार क्यों?

मान्यवर,


मैं जिस विषय पर आपका ध्यानाकर्षित कर रहा हWू वह है भारतीय संविधान १९५० की मूल भावना समाजवाद और उसके संरक्षण हेतु उपलब्ध तथाकथित कानून। जैसा कि आपको ज्ञात है कि हमारे संविधान की उद्देशिका निम्नवत है -


"हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को :


सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,


विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,


प्रतिष्ठा और अवसर की समता


प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में


व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की


एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए


दृढसंकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख २६.११.१९४९ को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"


समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए सर्वप्रथम सामाजिक न्याय फिर आर्थिक न्याय और तत्पश्चात राजनैतिक न्याय की बात कही गयी है। संविधान के अनुसार, संविधान की मूल भावना की रक्षा का भार न्यायपालिका पर है वे नियम और अधिनियम जो संविधानिक उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करते त्याज्य है। स्वतंत्रता की रक्षा का भार अन्तिम रूप नागरिकों का मूल कर्तव्य है तथा संविधान के अनुच्छेद ५१क-प्प् के अनुसार निम्नवत् है :-


"स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलनों को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शो को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करें।"


संविधान की उद्देशिका में ही न्यायिक प्रक्रिया के क्रम का उल्लेख किया गया है अर्थात सामाजिक न्याय समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक होना चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया के क्रम को ध्यान दें तो ज्ञात होता है कि सिविल न्यायालयों की भूमिका ही प्रथम होगी, सामाजिक और आर्थिक न्याय हो जाने के पश्चात ही, राजनैतिक न्याय दण्ड के उपायों की बात की जा सकती है। संविधान की मूलभावना को ध्यान दें तो ज्ञात होता है, भारत के समस्त नागरिक निर्दोष है, जब तक कि उनको सामाजिक और आर्थिक न्याय न दे दिया गया हो। यह अत्यन्त ही खेद का विषय है, राजनैतिक न्याय "दण्ड" पूर्वरूप में अग्रिम और नि:शुल्क है, जबकि सामाजिक और आर्थिक न्याय को गौण बना दिया गया है। शासन द्वारा भारत के नागरिकों को पकड़कर सर्वप्रथम दण्ड न्यायालय में लाया जाता है और नि:शुल्क दण्ड दिया जाता है, जबकि सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए भारत के नागरिकों को न्यायालय के कई वर्षो तक चक्कर लगाना पड़ता है, तथा न्यायिक प्रक्रिया की ओट में भारत के नागरिकों का न्यायालय और उससे संबधित स्टाफ पेशकार, वकीलो, अधिवक्ताओं तथा अन्य द्वारा कई वर्षो तक घोर सामाजिक, मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न किया जाता है, यह सर्व विदित है।


विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करते हुये जब भारत का नागरिक आंदोलन करता है तो "शान्ति भंग" का आरोप लगाकर शासन के प्रतिनिधि दण्ड न्यायालय द्वारा, बिना सामाजिक और आर्थिक न्याय की विवेचना किये हुये, उसे जेल में डाल दिया जाता है। जिससे प्रतिष्ठा और अवसर की समता स्वत: नष्ट हो जाती है। इस आधुनिक सामंतवाद के चलते, भारतीय समाजवाद के तीन स्तम्भ न्याय, स्वतंत्रता और समता का कथित रूप भारतीय नागरिक झेलने को बाध्य है। परिणामत: व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता तथा बन्धुता का नवीन रूप संयुक्त अराजकता, संयुक्त भ्रष्टाचार, संयुक्त हिंसा, आतंकवाद भारत संघ के हर राज्य में दिखायी पड़ रहा है।


(ए) संसद और राज्य की विधान सभाओं द्वारा ऐसे नियम और अधिनियम लगातार बनाये और पास किये जाते रहे हैं, जिसमें समाजवाद की मूल भावना विलुप्त है। दण्ड प्रक्रिया संहिता १९७३, भारतीय दण्ड संहिता १८६०, तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम १८७२, ऐसे ही नियम और अधिनियम है। यह अधिनियम प्रबन्धकीय सामंतवादी विचार धारा का उपभोग करने वाले सामंतियों का संरक्षण करने वाला कानून है। अपराध छ: तरह से हो सकता है। (१) प्रथम एक नागरिक का अन्य नागरिकों के प्रति (२) नागरिक का शासन (प्रबंधक, प्रशासक) के प्रति (३) अन्य नागरिको का नागरिक के प्रति (४) अन्य नागरिकों का शासन (प्रबन्धक, प्रशासक) के प्रति (५) शासन (प्रबंधक, प्रशासक) का नागरिक के प्रति (६) शासन (प्रबन्धक, प्रशासक) को अन्य नागरिक के प्रति। शासन सामान्यत: प्रशासकों और प्रबन्धकों द्वारा ही क्रियान्वित और संचालित किया जाता है। प्रशासकों एवं प्रबन्धकों द्वारा नागरिक तथा अन्य नागरिक के प्रति किये जाने वाले अपराधों का भारतीय दण्ड संहिता १८६० में कोई उपचार नहीं किया गया है। शासन द्वारा प्रदत्त नागरिक अधिकारों और सुविधाओं का उपभोग न कराना, शोषण और उत्पीड़न करना, अपराध की श्रेणी में नहींं रखा गया है। और न ही शोषण और उत्पीड़न को परिभाषित किया गया है। शासन (प्रशासको एवं प्रबन्धको) का नागरिक तथा अन्य नागरिको के प्रति, नागरिक का अन्य नागरिकों के प्रति तथा अन्य नागरिकों का नागरिक के प्रति किये जाने वाले आर्थिक अपराधों का दण्ड सामाजिक न्याय की श्रेणी में नहीं आता है। घोषित दण्ड नागरिक अथवा अन्य नागरिकों की आर्थिक हानि एवं मानसिक उत्पीड़न की छति पूर्ति नहीं करता है और न ही सुधारात्मक मानसिकता को अग्रसारित करता है। क्योंकि आर्थिक अपराध के कारणों का निदान उक्त अधिनियम में नहीं किया गया है अन्य तमाम खामियां इस दण्ड अधिनियम में है। यह दण्ड अधिनियम समाजवादी विचार धारा को अग्रसारित और संरक्षित करने वाला नहीं है।


(बी) स्वतंत्र देश भारत का कोई भी नागरिक या अन्य नागरिक अकारण ही अशान्ति नहीं फैलायेगा जब तक कि उसके साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक अन्याय न हो रहा हो। मात्र शान्ति भंग का आरोप लगाकर जेल में डाल देना, उसकी वाणी पर विराम लगा देना, सामाजिक, आर्थिक ओर राजनैतिक अन्याय का उपचार न करना, दण्ड न्यायालय द्वारा भारत के नागरिक का घोर उत्पीड़न और अत्याचार है। दण्ड प्रक्रिया संहिता १९७३ ऐसा ही विधान है, यह भारत के समस्त नागरिको को अपराधी मानता है। भारत के नागरिक सर्वप्रथम दण्ड न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं और बिना सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक कारण की विवेचना किये हुये उनको दण्डित किया जाता है। नागरिक अधिकार एवं न्याय, इन न्यायालयों में बैठे व्यक्ति की कृपा पर निर्भर करता है। दण्ड प्रक्रिया संहिता नागरिक अधिकारों का संरक्षण नहीं करती है और न ही न्याय की कुर्सी पर बैठे मजिस्ट्रेट को भारतीय नागरिक को निर्धारित समय सीमा के अन्दर सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय देने के लिए बाध्य करती है। दण्ड प्रक्रिया संहिता प्रबन्धको एवं प्रशासको पर कोई अंकुश नहीं लगाती है। संविधानिक मूल कर्तव्य आन्दोलन का दण्ड प्रक्रिया संहिता में कोई संरक्षण नहीं किया गया है और न ही "शान्ति भंग" को परिभाषित किया गया है।


प्रबन्धकों एवं प्रशासको के कुप्रशासन के खिलाफ नागरिक अथवा अन्य नागरिकों द्वारा आंदोलन कर देने के पश्चात भी, प्रबन्धकों एवं प्रशासको के दण्ड देने के प्रशासनिक अधिकार उन्हीं के पास सुरक्षित रहते हैं दूसरी तरफ दण्ड न्यायालयों द्वारा भारतीय नागरिक के खिलाफ दमनात्मक कार्यवाही की जाती है जोकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद २० की धारा (२) का खुला उल्लंघन है जोकि निम्नवत् है-"किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दंडित नहीं किया जायेगा।" दण्ड प्रक्रिया संहिता मजिस्ट्रेट को नागरिक तथा अन्य नागरिको को न्याय देने के कर्तव्य से बाध्य नहीं करती है। दण्ड प्रक्रिया संहिता समाजवादी देश होने के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करती है।


(सी) कानून के व्यवसायियों द्वारा साक्ष्य बनाये और मिटाये जाते हैं यह सर्वविदित है साक्ष्य अधिनियम १८७२ कानून के व्यवसायियों को उक्त कृत को रोकने का उपचार नहीं करता है। न्यायालय को नागरिक तथा अन्य नागरिकों को न्याय देने के कर्तव्यों से अवमुक्त करता है तथा न्यायालय की स्वतंत्र विवेचनात्मक शक्ति को शून्य करता है। साक्ष्य अधिनियम प्रथम इकाई श्रेणी के न्यायालयों की आWखों पर पट्टी के समान है तथा न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक विलम्ब उत्पन्न करता है एवं सामाजिक न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करता है।


वृतान्त- मैं संस्थान अभियांत्रिकी एवं ग्रामीण प्रौद्योगिकी संस्थान (आई०ई०आर०टी०) २६ चैथम लाइन्स, इलाहाबाद में कार्यशाला अनुदेशक (शिक्षक) के पद पर कार्यरत हWूं। संस्था प्रशासन के आवास आवंटन नीति के अनुसार आवास आवंटित न करने पर मैंने पॉंच चरणों में आंदोलन चलाया है। संस्था प्रशासन आई०ई०आर०टी० ने मेरे खिलाफ एफ०आई०आर० करके मुझे गिरफ्तार कराया, पुलिस प्रशासन ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा-१५१@१०७@११६ के तहत मुझे गिरफ्तार करके २४ अप्रैल ०४ को अपर नगर मजिस्ट्रेट प्रथम, इलाहाबाद के न्यायालय में प्रस्तुत किया तथा अपनी जॉंच आख्या निम्नवत् व्यक्त की -


"...........जॉंच के दौरान विदित हुआ है कि आई०ई०आर०टी० में अधिकारियों एवं कर्मचारियों के आवास आवंटन में अनियमितताएं आई०ई०आर०टी० प्रशासन द्वारा बरती जा रही है। जिसके विरोध में श्री कमलेश कुमार मित्रा द्वारा विरोध किया जा रहा है तथा उसी क्रम में आमरण अनशन व आत्मदाह की धमकी दी गयी थी।....."


पुलिस प्रशासन की जॉंच आख्या संस्था प्रशासन के कुप्रशासन तथा मेरे आंदोलन की पुष्टि करती है। फिर भी मजिस्ट्रेट द्वारा संस्था प्रशासन आई०ई०आर०टी० के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी है बल्कि उसी दिन मजिस्ट्रेट ने मुझे जेल भेज दिया। २४ अपै्रल ०४ को ही संस्था प्रशासन आई०ई०आर०टी० ने मुझे निलंवित किया है। दस माह पश्चात् भी निलंबन की कार्यवाही पूर्ण नहीं की गयी है। जीवन-निर्वाह भत्ता भी नियमानुसार नहीं दिया जा रहा है। अपर नगर मजिस्ट्रेट प्रथम से मैं कई बार शिकायत कर चुका हWूं किन्तु उन्होने संस्था प्रशासन आई०ई०आइ०टी० के खिलाफ आज तक कोई कार्यवाही नहीं की है। मेरे शिकायती लिखित पत्र को भी लेने से इन्कार कर दिया है। मजिस्ट्रेट ने यह तक कह डाला कि "इस न्यायालय से केवल जेल भेजा जाता है" जब मैंने उनसे न्याय देने के लिए याचना की थी।


इसलिए कथित दण्ड विधान संविधानिक उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करता है प्रबंधकीय कुप्रशासन को संरक्षण देने वाला सामंतवादी कानून है। इसका न्यायिक प्रक्रिया में बने रहने का कोई संविधानिक औचित्य नहीं है।


विदित हो कि मैंने राष्ट्रपति महोदय के समक्ष प्रेषित पत्र दिनांक २६ जनवरी ०५ में आधुनिक सामंतवाद के विरोध में आन्दोलन के प्रथम चरण में दण्ड प्रक्रिया संहिता १९७३, भारतीय दण्ड संहिता १८६० तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम १८७२ के दाह संस्कार की उद्घोषणा की है। उक्त तीनों ही अधिनियमों का दाहसंस्कार न्यायालय अपर नगर मजिस्ट्रेट प्रथम, इलाहाबाद के न्यायालय के समक्ष दिनांक १६ मार्च ०५ समय १२:३० बजे पर किया जायेगा। मैं समस्त प्रबुद्ध वर्ग से आंदोलन के समर्थन की अपील करता हWूं तथा द्वितीय चरण के आंदोलन के लिए आपके अमूल्य विचार एवं सुझाव आमंत्रित करता हWू। इस अपेक्षा के साथ कि शीघ्र ही समाजवादी देश में उत्पन्न हुये इस आधुनिक सामन्तवाद का अन्त कर दिया जायेगा।

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